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हैवान, इंसान और भगवान (Haivan, Insan aur Bhagwan)

₹367.50
SKU No. : 9789371006330
Motilal Banarasidas Publishing House
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Binding:Paperback
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1

"हैवान, इंसान और भगवान" को मैने पाँच अध्यायों (बुद्धि, प्रकति और संस्कति, हैवान और इंसान, इंसान और भगवान, धर्म) में व्यवस्थित किया है।

'बुद्धि' के माध्यम से मेरी जिज्ञासा है कि इंसान बुद्धिमान और विवेकशील है तो मूर्ख और विवेकहीन कौन हैं? हैवान (पशु) है तो वह जाति, प्रजाति, मजहब, वण, वर्ग राष्ट्र आदि में क्यों नहीं बंटा है?

'प्रकति और संस्कति' के माध्यम से मुझे लगा कि हैवान (पशु) पूरी तरह प्राकृतिक, इंसान प्राकृतिक कम, सांस्कृतिक (अप्राकृतिक) ज्यादा है। भगवान पूरी तरह से सांस्कतिक (अप्राखतिक) है।

'हैवान और इंसान' में मेरी जिज्ञासा है कि हैवान पतित है तो उसके उत्थान के लिए भगवान अवतार क्यों नहीं लेता? डरपोक है तो वह भूत-प्रेत, भगवान, बुरी नजर आदि से क्यों नहीं डरता? राजा है तो उसके राज्य में रंक क्यों नहीं होते? रंग बदलता है तो वह जान बचाने के लिए ही रंग क्यों बदलता है? माल (सत्ता, संम्पत्ति और कीर्ति) को बचाने के लिए रंग क्यों नहीं बदलता ? भौतिक है तो उसे आध्यात्मिक बनाने के लिए कोई क्यों नहीं आता?

'इंसान और भगवान' के माध्यम से मैने जानना चाहा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह शैतान के सामने दुर्बल क्यों है? जैसे ही पापी दृश्य, गोचर, लभ्य और साकार होते हैं, वैसे ही वह अदृश्य, अगोचर, अलभ्य और निराकार क्यों हो जाता हैं? कण-कण में है तो वह जंगलों में क्यों नहीं है? क्या इसलिए, कि वहाँ पवित्र नहीं होते तो पापी भी नहीं होते, ऊँच नहीं होते तो नीच भी नहीं होते?

'धर्म' सत्य है तो फिर शेर धर्म (सत्य) है, शेर की सवारी करने वाली देवी मजहब (असत्य) है। बकरी धर्म (सत्य) है तो 'बकरीद' मनाने वाला मजहब (असत्य) है। जब विज्ञान कहता है सृष्टि सृष्टा ने नहीं बनाई, स्वतः बनी है, तब सृष्टा नहीं, धर्म नाराज होते हैं, जब डार्विन ने सिद्ध किया कि धरती में जीवन का विकास अपने आप हुआ है, तब डार्विन को असिद्ध करने के लिए ईश्वर नहीं, धर्म आये। अगर कहो राम भगवान का अवतार नहीं था तो भगवान को नहीं हिन्दुओं को चोट पहुँचेगी। कहो कि ईसा ईश्वर के पुत्र नहीं थे तो ईश्वर आग-बबूला नहीं होगा, ईसाई आग बबूले हो जायेंगे। यदि कहो ह. मोहम्मद आखिरी पैगम्बर नहीं हो सकते तो अल्लाह नहीं, मुसलमान खफा हो जायेंगे। जब उपरोक्त धर्म खतरे में होते हैं, तब भी ईश्वर-अल्लाह खतरे से बाहर होता है। ऐसा क्यों? इसी लिये कि ये सब भगवान के भक्त नहीं, अपने-अपने धर्मों के अन्ध भक्त होते हैं।

पुस्तक का उद्देश्य न किसी को जमीन में उतारना है, न आसमान में चढ़ाना है, जो जैसा लगा, उसे वैसे ही बताना है।


Book Details:

Author: Dilwar Singh Rawat

Publisher: Motilal Banarsidass Publishing House

Edition: 1st

Publication Year: 2026

Pages: 365

Language: Hindi

Size: 5.5" x 8.5"

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